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Dhanurdhari Garhwali song marriage : उत्तराखंड की लड़कियों ने रखी शादी के लिए नई शर्त, जानिए कहां से आया ये न्यू ट्रेंड

Dhanurdhari Garhwali song marriage : नमस्कार दोस्तों, जैसा की इन दिनों सोशल मीडिया पर उत्तराखंड के लोकसंगीत से जुड़ा गढ़वाली गीत “मी हे बाबा यनु स्वामी छालू जु धनुर विद्या मा धनुरधारी होलू” इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त चर्चा में है।

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Instagram, YouTube और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस गीत को लेकर लगातार रील्स और वीडियो सामने आ रहे हैं। लोग इसे सुन रहे हैं, इस पर मजेदार प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं और कुछ यूजर्स इसे शादी से जोड़कर भी देख रहे हैं।

इस खबर में हम आपको बताएंगे कि यह गढ़वाली गीत अचानक सोशल मीडिया पर क्यों छा गया, इसके पीछे की पूरी कहानी क्या है और क्यों युवाओं के बीच इसे लेकर मजाकिया चिंता देखने को मिल रही है।

Dhanurdhari Garhwali song marriage सोशल मीडिया पर बना चर्चा का विषय

धनुरधारी गीत के वायरल होने के साथ ही सोशल मीडिया पर यूजर्स की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगीं।
कुछ यूजर्स का कहना है कि- पहले लड़कियां शादी के लिए फौजी लड़के की मांग करती थीं। इसके बाद सरकारी नौकरी जरूरी हुई। फिर देहरादून या हल्द्वानी में घर की डिमांड सामने आई। और अब सोशल मीडिया के मुताबिक, मांग पहुंच गई है धनुर विद्या में महारथी धनुरधारी तक।

यह पूरा ट्रेंड मजाकिया अंदाज में चल रहा है, लेकिन इसी ह्यूमर ने इस गीत को और ज्यादा वायरल कर दिया।

अब धनुर विद्या की कोचिंग लेनी पड़ेगी – युवाओं की मजेदार प्रतिक्रिया

धनुर विद्या की कोचिंग लेनी पड़ेगी – युवाओं की मजेदार प्रतिक्रिया

कुछ युवाओं ने इस ट्रेंड पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अब शायद युवाओं को धनुर विद्या सीखने के लिए कोचिंग लेनी पड़ेगी। हालांकि, यह बात भी पूरी तरह हास्य और सोशल मीडिया मजाक तक ही सीमित है।

हकीकत यही है कि आज भी उत्तराखंड में शादियों की सबसे बड़ी शर्त वही बनी हुई है, देहरादून या हल्द्वानी में घर धनुरधारी की मांग फिलहाल सिर्फ रील्स और कमेंट सेक्शन तक ही सिमटी हुई है।

अचानक कैसे ट्रेंड हुआ यह गढ़वाली गीत?

अब सबसे अहम सवाल यही है कि यह गीत अचानक सोशल मीडिया पर कैसे ट्रेंड कर गया? इसकी शुरुआत एक Instagram रील से हुई।

Instagram यूजर वैभवी रावत ने जागर गायिका पम्मी नवल के इस गीत पर एक रील बनाई थी। रील साधारण थी, लेकिन उसमें पहाड़ी भाव और मौजूदा सामाजिक संदर्भ साफ नजर आ रहा था।

रील के वायरल होते ही सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने इस गाने को और ज्यादा लोगों तक पहुंचा दिया। इसके बाद से तो इस गीत पर रील्स की जैसे बाढ़ सी आ गई।

जंगली जानवरों के खतरे से जुड़ा तर्क भी बना वजह

वैभवी रावत ने अपने एक वीडियो में यह भी कहा कि उत्तराखंड में जिस तरह जंगली जानवरों का खतरा लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में अब सबसे पहले जरूरत धनुरधारी वर्ग की ही होगी।

यह बात मजाक के साथ-साथ एक तर्क के रूप में कही गई, जिसे सोशल मीडिया यूजर्स ने खूब पसंद किया।
ह्यूमर और लोकल मुद्दों का यह मेल ही इस ट्रेंड की सबसे बड़ी ताकत बना।

कौन हैं धनुरधारी गीत की गायिका डॉ. पम्मी नवल?

यह गीत उत्तराखंड की प्रसिद्ध जागर गायिका और शिक्षिका डॉ. पम्मी नवल का है। आपको बता दें कि डॉ. पम्मी नवल चमोली जिले के कर्णप्रयाग पोखरी विकास खंड में शिक्षिका हैं, जो उत्तराखंड की लोक परंपरा से जुड़े जागर गीतों के लिए जानी जाती हैं |

डॉ. पम्मी नवल शिक्षा और लोकसंगीत दोनों क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, उनके गीतों में लोककथा, परंपरा और भावनाएं साफ झलकती हैं, जो आज की डिजिटल पीढ़ी को भी आकर्षित कर रही हैं।

दो साल पुराना गीत, 2025 में बना ट्रेंड

धनुरधारी गीत कोई नया रिलीज नहीं हुआ है। बल्कि यह गीत करीब दो साल पहले रिलीज हुआ था। हालांकि, सोशल मीडिया की ताकत ने इस गीत को दोबारा नई पहचान दिला दी। आज स्थिति यह है कि –

  • YouTube पर इस गीत को 20 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है
  • Instagram पर हजारों रील्स इस गीत पर बन चुकी हैं

ये आंकड़े YouTube के सार्वजनिक व्यू काउंट और सोशल मीडिया ट्रेंड्स से स्पष्ट होते हैं।

गायिका पम्मी नवल का बयान

डॉ. पम्मी नवल का कहना है कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनका यह गीत इतने समय बाद सोशल मीडिया पर वायरल हो जाएगा।

उनके अनुसार, यह ट्रेंड पूरी तरह लोगों के प्यार और सोशल मीडिया की ताकत का नतीजा है। यह किसी प्रचार रणनीति का हिस्सा नहीं था।

द्रोपदी स्वयंवर गीत भी आया चर्चा में

धनुरधारी गीत के साथ-साथ डॉ. पम्मी नवल का एक और गीत द्रोपदी स्वयंवर भी सोशल मीडिया पर चर्चा में है। यह गीत वर्ष 2023 में रिलीज हुआ था, लेकिन 2025 में अचानक Instagram पर इस पर बड़ी संख्या में रील्स बनने लगीं, लोककथा आधारित यह गीत भी युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

लोकगीतों की डिजिटल वापसी क्या संकेत देती है?

धनुरधारी गीत का वायरल होना यह दिखाता है कि आज की डिजिटल पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ना चाहती है। अगर कंटेंट सच्चा, भावनात्मक और लोकसंस्कृति से जुड़ा हो, तो वह देर से ही सही, लेकिन अपनी पहचान जरूर बनाता है।

निष्कर्ष:

धनुरधारी गीत को लेकर चल रहा ट्रेंड न तो शादी की शर्तें बदलने वाला है और न ही युवाओं को धनुष-बाण थमाने वाला है।यह ट्रेंड सिर्फ यह साबित करता है कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। “मी हे बाबा इन स्वामी छान लू जो धनुर विद्या मा धनुदार हो…” अब सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर पहाड़ी पहचान की आवाज बन चुका है।

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